औपचारिकता और वैचारिक दूषण
औपचारिकता प्रायः सामाजिकता का पर्याय बन कर रह जाती है। गौर करें किस तरह हम समय समय पर खुद को सामाजिकता में ढालने के लिए औपचारिकता का अनुसरण करने के लिए बाध्य हो जाते है। औपचारिकता से ही धनराशि का अर्जन संभव होता हैं, औपचारिकता से ही सामाजिक मित्रजन बनते हैं, और औपचारिकता से ही हमारा सामाजिक आधिपत्य स्थापित होता है। आज के दौर में औपचारिकता ही हमे व्यवसाय में बांध के रखती है। पारिवारिक शांति के पीछे सबसे बड़ा राज है औपचारिकता जिसकी अवहेलना करते ही रिश्ते नातो का बुरी तरह से हनन हो जाना स्वाभाविक ही नहीं, निश्चित हो जाता है। सामाजिक ढर्रा ही पूर्ण रूप से औपचारिकता पर बसा हुआ है। अंग्रेजी शब्द 'इंस्टीट्यूशन' भले ही विवाह का हो परिवार का या शिक्षा का - सामूहिक सोच का निर्वाह करना अनिवार्य हो जाता है। ये ही नही, सामाजिक तौर पर लोग अपने हितानुसार अच्छे खासे नियम कानून भी बना लेते हैं इस हद तक कि नियमों की संरचना का चक्रव्यूह तोड़ना एक हार जीत, मान सम्मान की होड़, और न्याय-अन्याय के तराजू का पलड़ा सा बन कर रह जाता है। लोग विभाजित हो जाते हैं, सीमित रह जाते हैं अहम और दुस...