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औपचारिकता और वैचारिक दूषण

औपचारिकता प्रायः सामाजिकता का पर्याय बन कर रह जाती है। गौर करें किस तरह हम समय समय पर खुद को सामाजिकता में ढालने के लिए औपचारिकता का अनुसरण करने के लिए बाध्य हो जाते है। औपचारिकता से ही धनराशि का अर्जन संभव होता हैं, औपचारिकता से ही सामाजिक मित्रजन बनते हैं, और औपचारिकता से ही हमारा सामाजिक आधिपत्य स्थापित होता है। आज के दौर में औपचारिकता ही हमे व्यवसाय में बांध के रखती है। पारिवारिक शांति के पीछे सबसे बड़ा राज है औपचारिकता जिसकी अवहेलना करते ही रिश्ते नातो का बुरी तरह से हनन हो जाना स्वाभाविक ही नहीं, निश्चित हो जाता है।  सामाजिक ढर्रा ही पूर्ण रूप से औपचारिकता पर बसा हुआ है।  अंग्रेजी शब्द 'इंस्टीट्यूशन' भले ही विवाह का हो परिवार का या शिक्षा का - सामूहिक सोच का  निर्वाह करना अनिवार्य हो जाता है। ये ही नही, सामाजिक तौर पर लोग अपने हितानुसार अच्छे खासे नियम कानून भी बना लेते हैं इस हद तक कि नियमों की संरचना का चक्रव्यूह तोड़ना एक हार जीत, मान सम्मान की होड़, और न्याय-अन्याय के तराजू का पलड़ा सा बन कर रह जाता है।  लोग विभाजित हो जाते हैं, सीमित रह जाते हैं अहम और दुस...

back dated 2011- 14

 विनम्रता की कसौटी कई पल खूबसूरत होते हैं और अनेकों हम खूबसूरत बना सकते हैं. यह तो काफी जानी मानी अभिव्यक्ति है. खासतौर से यह ही विचार है जो हमारी विज्ञापन की दुनिया में प्रायः हर युक्ति के साथ प्रस्तुत किया जाता है. शायद यही एक सृष्टि का गौरवान्वित रूप या हिस्सा है जो सभी के मन में बस्ता है और सभी के कर्म का हिस्सा बन कर उपियोगी सिद्ध होता है. खूबसूरती की बहिनें भी हैं- स्वेच्छा, सबसे बड़ी बहिन, आशा मंझली और खूबसूरती से छोटी विनम्रता. विनम्रता है सबसे छोटी पर सबसे ज्यादा बलवान भी है - तन मन धन से सर्वगुण संपन्न. स्वेच्छा थोड़ी हठी है, आशा एक हद तक शांत है, खूबसूरती जागरूक है और विनम्रता, सबसे छोटी है इसलिए आसानी से अदृश्य रह जाती है. ज्यादा बातें नहीं करती पर बेहद नेक और व्यवाहारिक है. इसलिए हम सभी के लिए सबसे ज्यादा आवश्यक साबित हो जाती है. सभी बहनें हमारे जीवन में खुशियों का उजाला लाती हैं, और इनके बिना हमारा जीना थोडा कठिन हो जाता है. पर क्योंकि जीवन जीना इनके बिना आसान नहीं हैं, हम सभी प्राणी समय समय पर इनका और इनसे मिले हुए लाभ का सदुपियोग करने में नहीं चूकते हैं. विनम्रता ...

back dated 2011-14

समय का उपयोग सामर्थ्य की बात करें तो एहसास होता है कि कितनी ही बार हम बस सोच कर ही जीते चले जाते हैं. सोच के रूप में ही हमारी, सद्भावना और सदगुण नामक सकारात्मक प्रत्यक्ष प्रस्तुतियां लोगों को नज़र आती है. दर्शनशास्त्री हर युग के, कुछ जाने माने, कुछ नए इजात किये हुए सिद्धांत आम जनता, मुख्यतः विद्यार्थी जन एवं उन सभी के समक्ष प्रस्तुत कर पाते हैं, जो उस सोच को किसी भी प्रकार से उपयोगी मान सकें. ज्यादातर सभी विषय प्रायः शिक्षास्तरीय वर्षों में ही कामगार साबित होते हैं. एक बार व्यक्ति विद्या ग्रहण करने के वर्षों के परे जब सामाजिकता में पहुँच जाता है तो यह एक वैयक्तिक निर्णय मात्र रह जाता है कि वह व्यक्ति कौन सी और किस प्रकृति की पढाई पर ध्यान दे और उसका सार्वजनिक एवं निजी उपयोग करे. यहाँ हमारी सोच की समृद्धि सकारात्मक या नकारात्मक, सही व गलत, उपयोगी एवं अनुपयोगी साबित होती है. सामर्थ्य का, अतः, हमें न सिर्फ विवेक के साथ ही, बल्कि स्वावलंबन एवं पुरुषार्थ के साथ उपयोग करना चाहिए. F-100, Profit Centre, Mahaveer Nagar, Kandivali (W), Mumbai--67 सुप्रिया आसोपा सक्सेना

back dated - 2011-14

  दूरदर्शिता प्रायः सब में होती है. हम में से कितने लोग होते हैं जो घंटो एकांत में बैठ कर सोचते रहते हैं - ऐसे लोग जो एकांत सिर्फ इसलिए पसंद करते हैं और अकेलापन चुनते हैं क्योंकि उनसे सन्नाटा, खामोशी बातें करती है... विचार, कल्पना के रूप में या ख्यालों के रूप में आँखों के सामने - बंद या खुली, डोलते हैं, हरकते करते हैं और ऐसे लोगों को एहसास दिलाते हैं कि वे सही हैं, उनके कर्म से और धर्म से, दुनिया माने या नहीं. उनका एकांत ही इस बात का द्योत्तक होता है कि वे अकेले हैं, बिना समर्थन के. उनका मनोबल ही उनका शस्त्र होता है और उनकी मानसिकता, उनकी सीख और समझ. F-100, Profit Centre, Mahaveer Nagar, Kandivali (W), Mumbai-67 सुप्रिया आसोपा सक्सेना

back dated 2011-2014

  विचारों का आकर्षक प्रदर्शन - जन संचार जी हाँ ! जन संचार है विचारों का आकर्षक प्रदर्शन। और यह संभव करते हैं वे सभी लेखक गण जो समझने की चेष्ठा करते हुए समझ ही जाते हैं की जनता जनार्दन को क्या चाहिए। बेहतरीन तरीके से मुझे भी समझ आ ही गया कि क्या कहूं जो कोई समझना चाहे... कम से कम पढ़े तो सही। जब तक कोई पाठक जन यह कथन नहीं पढ़ लें तब तक यह भी साबित होना संभव नहीं है कि यहाँ लिखा हुआ सब कुछ पहले नहीं लिखा जा चुका है. फिर भी आशा यही है कि जो भी यहाँ लिखा है उसके पीछे छुपी हुई भावना को - एक संचार विषय की विद्यार्थी की अभिव्यक्ति समझ कर ग्रहण करें। संचार काफ़ी अद्भुत कला है, यह बात मुझे पता चली नाटक की प्रयोगशाला में भाग लेकर, कुछ वर्षों पहले. दिग्गज गणों से भेंट हो सकी थी जिन्हें हम प्रायः फिल्मों में या टीवी पर ही देखते हैं और पसंद करते हैं। नाटक शैली द्वारा संचार एक अद्भुत एवं मुदित कर देने वाली कला है और इसके प्रेक्षक एवं आलोचक काफी दिमाग और विवेक का उपयोग करने वाले लोग होते हैं, पूर्ण आदर सहित कहूंगी - हस्ती होते हैं। ज़बरदस्त बात विवेक और बुद्धि के ऊपर - ये विवेकी लोग अपने कार्यकौश...