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समय का उपयोग


सामर्थ्य की बात करें तो एहसास होता है कि कितनी ही बार हम बस सोच कर ही जीते चले जाते हैं. सोच के रूप में ही हमारी, सद्भावना और सदगुण नामक सकारात्मक प्रत्यक्ष प्रस्तुतियां लोगों को नज़र आती है.

दर्शनशास्त्री हर युग के, कुछ जाने माने, कुछ नए इजात किये हुए सिद्धांत आम जनता, मुख्यतः विद्यार्थी जन एवं उन सभी के समक्ष प्रस्तुत कर पाते हैं, जो उस सोच को किसी भी प्रकार से उपयोगी मान सकें.

ज्यादातर सभी विषय प्रायः शिक्षास्तरीय वर्षों में ही कामगार साबित होते हैं. एक बार व्यक्ति विद्या ग्रहण करने के वर्षों के परे जब सामाजिकता में पहुँच जाता है तो यह एक वैयक्तिक निर्णय मात्र रह जाता है कि वह व्यक्ति कौन सी और किस प्रकृति की पढाई पर ध्यान दे और उसका सार्वजनिक एवं निजी उपयोग करे.

यहाँ हमारी सोच की समृद्धि सकारात्मक या नकारात्मक, सही व गलत, उपयोगी एवं अनुपयोगी साबित होती है.

सामर्थ्य का, अतः, हमें न सिर्फ विवेक के साथ ही, बल्कि स्वावलंबन एवं पुरुषार्थ के साथ उपयोग करना चाहिए.

F-100, Profit Centre, Mahaveer Nagar, Kandivali (W), Mumbai--67


सुप्रिया आसोपा सक्सेना

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