back dated- 13.09.12
अत्याधिक निर्वाह
निर्वाह जीवन जीने का पर्याय है और जिस तरह किसी भी बात को अत्याधिक खींचने मे या करने मे या महसूस भी करने मे मनुष्य की निजि हानि ही होती है उसी तरह निर्वाह करने की भी एक सीमा तय करना आवश्यक है.
निर्वाह करने की प्रक्रिया भले ही खूबसूरत हो या नही , निर्वाह करने की एक 'व्यक्तिगत परिभाषा' स्थापित करनी ज़रूरी है. तभी, अन्य लोग जो उस निर्वाह का प्रसाद चख रहे हो, उनको उस प्रसाद का विशेष फल मिल सकता है. अन्यथा ज़रूरी नही है कि निर्वाह करने वाले व्यक्ति को उसका निजि यश प्राप्त हो ही.
हाँ, यह एक समयानुकूल विषय है समझने और स्वीकारने के लिये कि निर्वाह मात्र एक क्रिया और प्रक्रिया ही नही है, यह इंसानी हित और अनहित की कथा भी है जो हम मे से ज़्यादातर लोग न समझते और जानते हैं और न ही दूसरो को किसी भी अच्छे कार्य का गलत फायदा उठाने से रोक पाते हैं.
सुप्रिया आसोपा सक्सेना
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