औपचारिकता और वैचारिक दूषण
औपचारिकता प्रायः सामाजिकता का पर्याय बन कर रह जाती है।
गौर करें किस तरह हम समय समय पर खुद को सामाजिकता में ढालने के लिए औपचारिकता का अनुसरण करने के लिए बाध्य हो जाते है।
औपचारिकता से ही धनराशि का अर्जन संभव होता हैं, औपचारिकता से ही सामाजिक मित्रजन बनते हैं, और औपचारिकता से ही हमारा सामाजिक आधिपत्य स्थापित होता है।
आज के दौर में औपचारिकता ही हमे व्यवसाय में बांध के रखती है। पारिवारिक शांति के पीछे सबसे बड़ा राज है औपचारिकता जिसकी अवहेलना करते ही रिश्ते नातो का बुरी तरह से हनन हो जाना स्वाभाविक ही नहीं, निश्चित हो जाता है।
सामाजिक ढर्रा ही पूर्ण रूप से औपचारिकता पर बसा हुआ है।
अंग्रेजी शब्द 'इंस्टीट्यूशन' भले ही विवाह का हो परिवार का या शिक्षा का - सामूहिक सोच का निर्वाह करना अनिवार्य हो जाता है।
ये ही नही, सामाजिक तौर पर लोग अपने हितानुसार अच्छे खासे नियम कानून भी बना लेते हैं इस हद तक कि नियमों की संरचना का चक्रव्यूह तोड़ना एक हार जीत, मान सम्मान की होड़, और न्याय-अन्याय के तराजू का पलड़ा सा बन कर रह जाता है।
लोग विभाजित हो जाते हैं, सीमित रह जाते हैं अहम और दुस्साहस के दायरे में और अंग्रेजी का शब्द - 'पावर प्ले' का दुरुपयोग कूटनीति मात्र बन कर रह जाता है।
होड़ है समाज में पावर प्ले की।
परिवार, समुदाय नष्ट हो चुके हैं, और होते रहेंगे क्योंकि आदतन हो चुका है समाज औपचारिकता का दायरा बना कर पावर प्ले द्वारा न्याय का उल्लंघन करने का।
ये तो पूर्ण रूप से बोरियत भरी बात हो गई है अगर हम दशकों से जाने माने पहलुओं का जिक्र इस लेख में करने बैठें तो। क्योंकि दशकों से चलती हुई वैचारिक कूट नीति हर सामाजिक संस्था - परिवार, विवाह या शिक्षा को न सिर्फ दूषित कर चुकी है वरन ऐसे वैचारिक दूषण के हम आदि हो चुके हैं। हमे पता ही नही रहा है सोचने का असली तरीका।
वैचारिक दूषण ने सामाजिक संरचना की मासूमियत भंग की है वर्षो से। ये विचार कौन से रहे हैं हम सब पीढ़ी दर पीढ़ी जानते आए हैं।
उदाहरणत: नवीन नस्ल अस्वीकार करती है विवाह संस्था में बसे दूषण को, पर विवाह संस्था में प्रवेश करते ही अस्वीकार करने वाले युवा वर्ग सर्वत्र 'आउटसाइडर' बन कर रह जाते हैं और दोषारोपण होता हैं परिवार पर। नवीन नस्ल ही नहीं अपितु नवीन नस्लों को सत्य और तथ्य का ज्ञान देने वाले ऐसे कुछ गिने चुने मुट्ठी भर परिवार जन को भी सामना करना पड़ता है विवाह की रीति नीतियों का जो कहीं न कहीं औपचारिकता के आंचल में कटुता छुपाए लुभावनी प्रस्तुति मात्र रह गई हैं।
परिवार में व्यवहारिक कूटनीति दबाती है आपसी सौहार्द्र को। पारिवारिक सामुदायिक भेद सामने लाया जाता है, पीढ़ियों में खोट निकाली जाती है। यानी शुरुआत कहां से हुई इस बहस की - औपचारिकता के फलस्वरूप।
अन्य सभी संस्थाएं - शिक्षा की, उन्नति की, दोस्ती की - औपचारिकता एवं बैचारिक दूषण संबंधित गलतफहमी का शिकार होती रही हैं।
आशा है कि मानवता एवं मानवीय जागृति के चलते कुछ और वर्ष ही टिकेगा औपचारिकता के आंचल में छिपा हुआ ये वैचारिक दूषण।
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