backdated 2011-14

यथार्थ की जीवन से मांग

गुनीजन कहते हैं कि 'यथार्थ' कोई कठिन शब्द या परिभाषा नहीं है बस आस पास के सत्य को यह नाम दिया जाता है. आसपास में तो सब कुछ शामिल होता है, घर, बाहर, सामान, और लोग. 

हाँ. 

तो गुनिजन कहते हैं कि सब कुछ मतलब ये सब भी - व्यक्ति, वस्तु, स्थान और भाव. तो फिर एक कल्पना उठती है दिमाग में...क्या पता हमारा, तुम्हारा, सबका, यथार्थ एक बेहतर विवरण मांग रहा हो सब से, यानि- कोई भी 'एक' यथार्थ, 'अपने' जग से. यह परिकल्पना, मेरे ख्याल से कुछ अधूरी या गलत नहीं है- ऐसा हो सकता है यदि बाकी कुछ सत्य जैसे सिनेमा या संगीत का दिमाग पर असर हम और तुम सच मानते हों. 

अगर यथार्थ हर किसी का अलग हो सकता है तो यथार्थ बनाया हमने और तुमने ही है...सो एक उम्दा दृश्य सामने आ जाता है कि हम यथार्थ का चेहरा अपने लिए और थोडा सुन्दर और मोहक बना दें.

F-100, Profit Centre, Mahaveer Nagar, Kandivali (W), Mumbai-67.


सुप्रिया आसोपा सक्सेना


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