संदेश

जून, 2021 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

back dated 17.12.11

  महिला , स्वयंसिद्धा          हमारे देश में कुछ महिलाएं गर्व से काम करती हैं , पैसे कमाती हैं और अपने पति के साथ परिवार का दायित्व या भार अपने कन्धों पर उठाती हैं. कहा जा सकता है यह काम करने का चलन सामाजिक स्तर पर बनायीं गयी एक सीढ़ी का हिस्सा है या उपज है कि शायद चुने हुए परिवारों से निकली हुई महिलाएं ही ऐसे कम करके , यानी पैसे कमा कर ख़ुशी से बयान या स्वीकार भी करती हैं या करना चाहती हैं. यह विचार बिना किसी शोध के प्रस्तुत कर रही हूँ आपके समक्ष और यह विचार मात्र ही है , क्योंकि शोध या अनुभव के नाम पर कुछ मुट्ठी भर परिवार ही हैं जिसकी लड़कियां- बेटियों , बहुओं और माताओं के रूप में ही मेरी जानकारी में रही हैं. यह सामान्यतः ऐसे परिवार हैं जो आसानी से मध्य वर्गीय परिवारों कि श्रेणी में रखे जा सकते हैं. रहन सहन के तरीकों से नहीं - सिर्फ मानसिकता की दृष्टि से सम्भोधित रही हूँ. इन परिवारों की लड़कियां प्रायः ग्रेजुएशन कर चुकी होती हैं और एक उम्र के पश्चात् या साथ साथ रसोई में अपने घर की बड़ी और बुजुर्ग सदस्याओं के साथ हाथ बंटाती हैं , इच्छा से भी और अन...

back dated - 21.10.11

  हमारा मानसिक प्रतिबिम्ब यह एक बहुत ही जटिल अभिव्यक्ति है , ' मानसिक प्रतिबिम्ब '. इसमें बहुत सारे पहलू समाहित हैं , कुछ तो हमारे अपने दिमाग की उपज हैं और कुछ हमारे माहौल की और हमारी काल्पनिक गहनताओं की भी. मानसिक प्रतिबिम्ब आसानी से समझा जा सकता है , उदाहरण के तौर पर , बच्चों के लिए बनायीं गयीं चित्रकथाएं - इसका, शब्द के स्थान पर प्रयोग करती आई हैं. हमारा मानसिक प्रतिबिम्ब हमें नज़र आ सकता है अन्य किसी को नहीं और तब ही जब हम कभी एकांत में खुद को टटोलते हैं. हमारे चेहरे पर सौन्दर्य या कहें हमारा आतंरिक सौन्दर्य भी इस प्रतिबिम्ब से बहुत हद तक प्रभावित हो कर निखरता एवं ढलता है. और दिलचस्प बात यह है कि हम जब सब के सामने अपना मुख सौन्दर्य लिए घूमते हैं तो भी हमारे चेहरे पर भाव इस प्रतिबिम्ब को छुपाने में सक्षम नहीं हो पाते हैं. अजब ही होता है हमारा यह मानसिक प्रतिबिम्ब! होता तो यह अजब है पर होता ही क्यों है ? यह महज एक सवाल ही नहीं चिंतन का सरोकार भी है. हम प्रतिबिम्ब शब्द का प्रयोग और इसको स्वीकृति दे रहे हैं मतलब यह एक वस्तु तो नहीं है जो की छूकर पाई या लुटाई जा सके. ...

back dated- 04.10.12

  जीवन का असीम सम्बल  जीवन बहुत खूबसूरत यथार्थ है और हमारा खुशनसीब है - हमे समझना चाहिये कि हमे एक अवसर मिलता है खुद को संवारने का. यह पढ कर पाठक ज़रूर सोचेंगे कि यहाँ पढने वाले लोग तो कम ही होते हैं फिर ऐसे गहन विचार यहाँ प्रस्तुत करने का फायदा क्या है ? ओन लाइन काफी ज़बरदस्त वाक्या है इंसानी ख्यालो और अभिव्यक्ति के समूह प्रदर्शन का तो ज़ाहिर सी बात है कि जो थोडे बहुत लोग यहाँ लिखे विचार पढते हैं कम से कम, वो एक दो विचार के प्रति तो अपनी सहमति रखते होंगे और उसी से ही यहाँ लिखने का संतोष प्राप्त हो जाता है. यह भी कटु सत्य है कि अधिकांश लोग जो अपने मापदंडो के साथ ज़िंदगी बिताते है वो तो शायद ओन लाइन लेखन प्रक्रिया के प्रति रुझान भी नही रखते होंगे, बस उम्मीद पर दुनिया कायम है! तो विचार फिर से जीवन के सौंदर्य पर ही केंद्रित है -  लेखन एक तरह से जीने का ही पर्याय है, इसके अलावा तो लेखन शैली का कोई उपयोग या सार्थकता समझ नही आती - तो इस विचार को मद्देनज़र रखते हुए यह कहने का मन करता है कि 'फिलोसोफी' क्यो खासी भारी भरकम प्रतीत होती है विषय के रूप मे... जीवन के बारे मे अभिव्यक्ति से ल...

back dated- 13.09.12

कभी खुशी कभी गम ये दोनो हमारे जुडवा हैं , या कहे , सिक्के के दो पहलू – सदैव हमारे इर्द-गिर्द और हमारे साथ रहते हैं. हम मे से ज़्यादातर लोग एक दूसरे के हैं और जब एक से ज़्यादा लोग साथ रहते हैं तो यह ही सम्भव है कि खुशी और गम दोनो का वास्ता हमारे साथ , साथ-साथ जुडा रहता है. क्या यह आसान सी ही बात है ? एक जन की खुशी दूजे जन का गम एक होड बन कर रह जाते हैं – बाहरी प्रतिस्पर्धा - आंतरिक कशमकश ... खुशी का पलडा कैसे भारी करे हम ? सुप्रिया आसोपा सक्सेना

back dated- 13.09.12

अत्याधिक निर्वाह निर्वाह जीवन जीने का पर्याय है और जिस तरह किसी भी बात को अत्याधिक खींचने मे या करने मे या महसूस भी करने मे मनुष्य की निजि हानि ही होती है उसी तरह निर्वाह करने की भी एक सीमा तय करना आवश्यक है. निर्वाह करने की प्रक्रिया भले ही खूबसूरत हो या नही , निर्वाह करने की  एक 'व्यक्तिगत परिभाषा' स्थापित करनी ज़रूरी है. तभी, अन्य लोग जो उस निर्वाह का प्रसाद चख रहे हो, उनको उस प्रसाद का विशेष फल मिल सकता है. अन्यथा ज़रूरी नही है कि निर्वाह करने वाले व्यक्ति को उसका निजि यश प्राप्त हो ही.  हाँ, यह एक समयानुकूल विषय है समझने और स्वीकारने के लिये कि निर्वाह मात्र एक क्रिया और प्रक्रिया ही नही है, यह इंसानी हित और अनहित की कथा भी है जो हम मे से ज़्यादातर लोग न समझते और जानते हैं और न ही दूसरो को किसी भी अच्छे कार्य का गलत फायदा उठाने से रोक पाते हैं. सुप्रिया आसोपा सक्सेना