back dated 17.12.11
महिला , स्वयंसिद्धा हमारे देश में कुछ महिलाएं गर्व से काम करती हैं , पैसे कमाती हैं और अपने पति के साथ परिवार का दायित्व या भार अपने कन्धों पर उठाती हैं. कहा जा सकता है यह काम करने का चलन सामाजिक स्तर पर बनायीं गयी एक सीढ़ी का हिस्सा है या उपज है कि शायद चुने हुए परिवारों से निकली हुई महिलाएं ही ऐसे कम करके , यानी पैसे कमा कर ख़ुशी से बयान या स्वीकार भी करती हैं या करना चाहती हैं. यह विचार बिना किसी शोध के प्रस्तुत कर रही हूँ आपके समक्ष और यह विचार मात्र ही है , क्योंकि शोध या अनुभव के नाम पर कुछ मुट्ठी भर परिवार ही हैं जिसकी लड़कियां- बेटियों , बहुओं और माताओं के रूप में ही मेरी जानकारी में रही हैं. यह सामान्यतः ऐसे परिवार हैं जो आसानी से मध्य वर्गीय परिवारों कि श्रेणी में रखे जा सकते हैं. रहन सहन के तरीकों से नहीं - सिर्फ मानसिकता की दृष्टि से सम्भोधित रही हूँ. इन परिवारों की लड़कियां प्रायः ग्रेजुएशन कर चुकी होती हैं और एक उम्र के पश्चात् या साथ साथ रसोई में अपने घर की बड़ी और बुजुर्ग सदस्याओं के साथ हाथ बंटाती हैं , इच्छा से भी और अन...