back dated - 21.10.11

 हमारा मानसिक प्रतिबिम्ब

यह एक बहुत ही जटिल अभिव्यक्ति है, 'मानसिक प्रतिबिम्ब'. इसमें बहुत सारे पहलू समाहित हैं, कुछ तो हमारे अपने दिमाग की उपज हैं और कुछ हमारे माहौल की और हमारी काल्पनिक गहनताओं की भी.

मानसिक प्रतिबिम्ब आसानी से समझा जा सकता है, उदाहरण के तौर पर, बच्चों के लिए बनायीं गयीं चित्रकथाएं- इसका, शब्द के स्थान पर प्रयोग करती आई हैं.

हमारा मानसिक प्रतिबिम्ब हमें नज़र आ सकता है अन्य किसी को नहीं और तब ही जब हम कभी एकांत में खुद को टटोलते हैं.

हमारे चेहरे पर सौन्दर्य या कहें हमारा आतंरिक सौन्दर्य भी इस प्रतिबिम्ब से बहुत हद तक प्रभावित हो कर निखरता एवं ढलता है. और दिलचस्प बात यह है कि हम जब सब के सामने अपना मुख सौन्दर्य लिए घूमते हैं तो भी हमारे चेहरे पर भाव इस प्रतिबिम्ब को छुपाने में सक्षम नहीं हो पाते हैं. अजब ही होता है हमारा यह मानसिक प्रतिबिम्ब!

होता तो यह अजब है पर होता ही क्यों है? यह महज एक सवाल ही नहीं चिंतन का सरोकार भी है. हम प्रतिबिम्ब शब्द का प्रयोग और इसको स्वीकृति दे रहे हैं मतलब यह एक वस्तु तो नहीं है जो की छूकर पाई या लुटाई जा सके. यह हमारे जीवन का, हमारी तनहाई और हमारी सम्पूर्णता या उसके अभाव का अंजाम है.

हम कब खुद से गैर हो गए या अजनबियों की संगति में खुद को पा लिया और यह कोई भी नहीं जान सका हमारे बारे में, ये सब स्थितियां और वाकये - ऐसे प्रतिबिम्ब को- हमारे मन के लिए, और समझ के अनुरूप और अनुकूल जन्म देते हैं. उदाहरण - फिल्म 'साउण्डट्रेक' में प्रमुख किरदार को अपना मानसिक प्रतिबिम्ब बार बार अनुभव होता दर्शाया गया- मुखौटे के रूप में.

यह भी कहना उचित ही है कि यह मानसिक प्रतिबिम्ब हम में से किसी को भी नज़र आ सकता है और आता ही होगा. आप सोचेंगे कि यह प्रतिबिम्ब हमारे अन्दर के दैत्य से भी क्या मेल नहीं खाता है? तो फिर फ़रिश्ता हमारा उजला रूप है, दैत्य हमारा काला रूप है और किसी को नज़र नहीं आता, प्रतिबिम्ब की तरह. पर ऐसा नहीं है.

प्रतिबिम्ब ही एकमात्र ऐसी मनःस्थिति है हमारी जो 'झलक' में नज़र आती है. ये हमारा रूप नहीं हमारा स्वयं को छलावा है जो हम खुद को धोखा या खुद के ज़मीर को धोखा देते समय ही अनुभव कर सकते हैं. तो स्पष्ट हो जाता है कि प्रतिबिम्ब बहुत ही जटिल है और हमारे अंतर्मन की सोच या चेष्टा या उद्वेलित भावनाओं का समागम है.

इससे निजात पाना संभव है या कठिन है?

यह मुख्यतः हम पर या व्यक्तिविशेष पर ही निर्भर करता है. एक इंसान या व्यक्ति अपने आप में कितना जागरूक है, विवेक के दम पर कितना जीवनयापन करता है और खुद की गुणात्मकता को, कैसे हर स्थिति और सामाजिक एवं वैयक्तिक ढांचों में संजीदगी और सौम्यता से डालता है.

हमारे 'मानसिक प्रतिबिम्ब- हमारे निजी 'फ़रिश्ते' और 'दैत्य' काफी हद तक हमारी ज़िन्दगी के अवलोकन में हमारे सहयोगी और सहायक साबित होते हैं, अगर हम हमारे निजी तथ्यों का सामना करने की क्षमता रखने में सक्षम हों.

सुप्रिया आसोपा सक्सेना

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