back dated 14.8.12
बातें करना अच्छा लगता है.
बातें करना अच्छा लगता है. सब ही तो करते हैं. करते ही रहते हैं. और सुनने में आता है और आसानी से स्वाभाविक तौर पर जानने को भी मिलता है कि बातों पर ही दुनिया कायम है।
दूजी बात तो इतनी सी है कि कुछ लोग बिना बात किये भी काम चलाते हैं.
सच है क्या?
ऐसा नहीं हो सकता।
अगर कोई आपसे नहीं बात करते हुए भी सामान्य रूप से जी रहा है तो तात्पर्य इस बात का एक ही है - वो व्यक्ति किसी न किसी से तो बातें कर के जी रहा है, यानि वो बस आपसे ही बात नहीं करके खुद में संतुष्ट है. ज़रूरी नहीं है कि वह वैयक्तिक तौर पर चुप या शांत इंसान है।
यदि आप इस वक्तव्य को पढ़ कर एक पल के लिए हंस दिए तो और भी अच्छा है.
ऑनलाइन यानि इस इंटरनेट की दुनिया में घूमते हुए, लेखन द्वारा लोगों के जीए और बाँटे हुए लम्हों को पढ़कर ऐसा लगता है की प्रायः लोग एकांत में इसलिए ही जीते जाते हैं क्योंकि उनके द्वारा अपनापन देने पर भी बदले में लगाव नहीं मिलता है।
कई दफा बेहद खूबसूरत कृतियाँ पढने को मिलती हैं पर वे दर्द भरी होती है, इंतज़ार भरी भी। बस एक ही ताज्जुब होता है कि वे इत्तेफाक नहीं ज़ाहिर करती हैं ऐसे सन्दर्भ में।
प्रिय के साथ हम प्रिय बनकर क्यों नहीं रह पाते?
यह सवाल हालात को दस्तक देता है या भावना को या फिर इंसानी संवेदनाओं के दायरे को, यह तो व्यक्ति विशेष ही बता सकते हैं पर इस सवाल के जवाब हमें अपने अपनों से आवश्यक रूप से ले लेने चाहिये और समय रहते ही।
F-100, Profit Centre, Mahaveer Nagar, Kandivali (W), Mumbai-67
सुप्रिया आसोपा सक्सेना
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